प्रतिक्षा से परिणाम तक

लेखिका- ज्योति

बहुत आवेग था भरा भीतर
चेहरे पर मात्र कुछ लकीर
प्राण रक्षा की याचना करते
हो चुका था एक अकीर
पौरुष से राज करनेवाला कर्मवादी
आज देख रहा था तकदीर

एक शून्यता भविष्य के प्रति
सब कुछ लगता दूसरे के हाथ में
हिम्मत हारने की कायरता कतई नहीं
चमत्कार का विश्वास था साथ में
पालनकर्ता दुष्ट का विनाश करेंगे
अपने कर्त्तव्य पथ पर चलने के आर्ह में

मेघ के ताण्डव से त्रस्त प्रकृति
अवतार की रात्री थी बहुत काली
अष्टम सन्तान की प्रतीक्षा् करता
व्यग्र हृदय था बहुत भारी
तूफान के कोलाहल के बीच आखिर
गून्जा बाल कृष्ण की मायावी किलकारी

-ज्योति (यू० के०)

 


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