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भारतीय रिती-रिवाज़ एवं त्योहार

Indian Festivals and Culture

मिथिलांचल मे भ्रातॄ-द्वितीया

द्वारा ज्योति झा चौधरी (लंदन)

भ्रातॄ-द्वितीया पूरे हिन्दुओं मे एक प्रचलित त्योहार है। मिथिलांचल मे भी इस पर्व का विशिष्ठ महत्च है। कार्तिक शुक्ल द्वितीय मे मनाया जाने वाला यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम-बंधन को समर्पित होता है। इस पर्व से जुडी एक पौराणिक कथा है जिसके अनुसार यमुना ने अपने भाई यम के साथ यह पर्व मनाया था।

इस दिन बहने अपने भाई की पूजा करती हैं। अपने घर की सफाई कर षष्ठ-दल कमल का अल्पना आंगन या घर के फर्श पर बनाती हैं। यह अल्पना पारम्परिक तरिके से चावल को गीला पिसकर बनाया जाता है। जिसे मैथली मे “अडिपन” कहा जाता है। इस अल्पना पर एक कटोरा रखा जाता है।

भाई को किसी पीठी या आसन पर इस अल्पना के सामने बिठाया जाता है । लोटे मे जल लिया जाता है। पूजा के लिऐ छ्ह सफेद कुम्हरा के फूल, सिन्दुर, चावल का घोल (पिठार), छ्ह पान के पत्ते डंठल के साथ , छ्ह गोटा सुपाडी, बडी इलाईची, छोटी इलाईची, जायफल और हरीर जैसे चीजों की अवश्यकता होती है । अगर सफेद कुम्हरा का फूल (भोपरा, कुम्हरा) नही है तो गैंदे के फूल से काम लिया जाता है।

भाई को आसन पर बैठाकर उसका चावल के घोल और सिंदुर से तिलक करतें है फिर उस के दिनो हथेलियों पर तिलक कर पूजा का सारा सामान रख देते है और जल से धो देते है। यह प्रक्रिया तीन या पांच बार दोहराया जाता है। सारे सामान को धोकर अल्पना पर रखते हुए कटोरे मे गिराया जाता है और सभी सामान का पुन: उपयोग किया जाता है। जल से हाथ धोते समय बहने अपने भाई के लिए शुभकामना करते हुए निम्नलिखित पक्तियां गाती है:-

“यमुना नेतली यम के, हम नोतई छी भाई के,
जते दिन यमुनाक धार बहै तैत दिन भाई के अरुदा रहै”

अर्थात ’यमुना अपने भाई की पूजा करती है, मै अपने भाई की पूजा करती हूँ।
जब तक यमुना की धारा बहती रहे तब तक मेरे भाई की आयु रहे”

बदले मे भाई अपनी बहन को अपने वैभवानुसार उपहार देते है मान्यता है कि ऐसी पूजा करने वाली बहने वैधव्य और अन्य क्लेश से दुर रहती हैं।

बचपन में जहां यह त्योहार बहनो के लिए उपहार की लालसा और भाईयो को पूजा करवाने की खुशी देती है वहीं बडे हो कर यह त्योहार भाई-बहनों के लिए मिलने का अवसर बन जाता है

 

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