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सफल दांपत्य जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र

पति-पत्‍नी एक सिक्के के दो पहलू

डा० श्रीराम शर्मा आचार्य

पति-पत्‍नी दोनो का जीवन एक सिक्के के दो पहलू है दोनो मे अभिंन्ता है, एक्य है। दाम्पत्य जीवन स्त्री पुरुष की अन्‍नयता का गठबंधन है । अत: किसी प्रकार का दुराव, छिपाव, दिखावा, बनावटी व्यवहार और परस्पर अविश्‍वास, एक दुसरे के प्रति घृणा को जन्म देता हैऔर इसी से दाम्पत्य जीवन नष्ट-भ्रष्‍ट हो जाता है।

 

पति-पत्‍नी दोनो अपने मानसिक क्षेत्र में बहुत बडा एक कुटुम्ब होते हैं। अपनी मानसिक अवश्‍यकताओ के आधार पर पति-पत्‍नी से ही विभिन्‍न समय से सलाहकार की तरह मंत्री की सी योग्यता भोजन करते समय मां की वात्सलयता, आत्म सेवा के लिए आज्ञापालक नौकर, जीवन पथ मे एक अभिन्‍न मित्र, गृहणी, रमणी आदि, अकांक्षा रखता है। इसी तरह पत्‍नी भी पति से जीवन निर्वाह के क्षेत्र मे मां-बाप, दुख-दर्द मे अभिन्‍न साथी, कल्याण और उन्‍नति के लिए सदगुरु, कामनाओ की तृप्ति के लिए भरतार, सुरक्षा संरक्षण के लिए भाई आदि, के कर्त्वयपूर्ति की आशा रखती है। जब परस्पर इन मानसिक अवश्‍यकताओ की पूर्ति नही होती, तो एक दुसरे मे असंतोष की भावना उत्पन हो जाता है ।

 

एक दुसरे की भावनाओ का ध्यान रखते हुए, एक दुसरे की योग्यता वृर्द्धि खासकर पुरुषो द्धारा स्त्रियों के ज्ञानवर्धन मे योग देकर परस्पर क्षमाशीलता, उदारता, सहिष्णुता अभिन्‍ता, एकदुसरे के प्रति मानसिक तृप्ती करते हुए दाम्पत्य जीवन् को सुखी, समृद्ध बनाया जा सकता है।

इसके लिए पुरुषों को अधिक प्रयत्‍न करना अवश्यक है । वे अपने प्रयत्‍न व व्यवहार  से गृहस्थ जीवन की कायापलट कर सकते है। अपने सधार के साथ ही स्त्रियों की शिक्षा-दिक्षा, ज्ञानवर्धन, उन के कल्याण के लिए हार्दिक प्रयत्‍न करके दाम्पत्य जीवन को सफल बनाया जा सकता है । धैर्य और विवेक के साथ एक दुसरे को समझते हुए अपने स्वभाव, व्यवहार मे परिवर्तन करके ही दाम्पत्य जीवन को सुख-शान्तिपूर्ण बनाया जा सकता है ।

 

पति-पत्‍नी की परस्पर आलोचना दाम्पत्य जीवन के मधुर संबंधो मे खटास पैदा कर देती है। इससे एक दुसरे की आत्मीयता, प्रेम, स्‍नेहमय आकर्षण समाप्त हो जातें है। कई अपनी स्त्री की बात बात पर आलोचना करते हैं। उनके भोजन बनाने, रहन-सहन, बोलचाल, आदि तक मे नुक्ताचीनी करते हैं इससे स्‍त्रियो पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। पति की उपस्थिति उन्हे बोझ सी लगती है और वे उन्हे उपेक्षा तक करने लगती है।

 

स्‍त्रियां सदेब चाहती है कि उन का पति उनके काम, रहन-सहन, आदि की प्रशंसा करें। वस्तुत: पति के मुँह से निकला हुआ प्रशंसा का एक शब्द प‍त्‍नी को वह  प्रसन्‍नता प्रदान करता है जो किसी बाह्य साधन, वस्तु से उपल्बध नही हो सकती। दाम्पत्य जीवन मे जो परस्पर प्रशंसा करते नही थकते, वे सुखी, संतुष्‍ट व प्रसन्‍न रहते है।

 

जिन स्त्रियो को पति की कटु आलोचना सुननी पड्ती है, वे सदैव यह चाहती है कि कब वहां से हटे और पति की अनुपस्थिति मे वे अन्य माध्मो से अपने दबे हुए भावो की तृप्‍ति करती है। सखियों से तरह तरह  के गप्पे लडाती है, तरह- तरह के श्रिंगार करके बाज़ार मे निकलती है और यहां तक कि पर-पुरुषो के प्रशंसापात्र बन कर अपने भावों को पृप्‍त करने का भी प्रयत्‍न करती है । जो प्रेम व प्रशंसा उन्हे उन के पति से मिलना चाहती थी, वह उन्हे अन्यत्र ढूढने का प्रयत्‍न करती है । कई स्त्रीयां मानसिक रोगो से ग्रस्त हो जाती है, अथवा क्रोधी, चिडचिडे स्वभाव की झगडालू बन जाती है ।

 

इस तरह स्‍त्रियों द्धारा पति की उपेक्षा, आलोचना करना भी उतना ही विषेला है। पुरुषो को अपने काम से थक कर आने पर घर मे प्रेम व उल्लास का उमडता हुआ समुद्र लहराता मिलना चाहिए, जिससे उन की दिन भर की थकान, क्लांति, परेशानी धुल जाए । उनके साथ यदि पत्‍नी कटु आलोचना, वयग्य-बान, बच्‍चे की धर पकड, हाय हल्ले का सामना करना पडे तो उस आदमी का क्या हालत होगी, भुक्तभोगी इस का अंदाज़ा लगा सकते है। पति पत्‍नी का एक समान संबंध है, जिसमे न कोई छोटा, न कोई बडा है । दामप्त जीवन मे विषबृधि का एक कारण परस्पर और आदर-भावनाओ की कमी भी है।