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अमरीका में मध्यावधि चुनाव   

अमरीका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार-वर्षीय कार्यकाल के बीच में कराए जाते हैं इसलिए इन्हें मध्यावधि चुनाव कहा जाता है. मतदान अमरीकी काँग्रेस के दो सदनों यानी हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट के लिए होता है.

काँग्रेस के दोनो सदनों में हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव बड़ा है. इसमें सीटों की संख्या 435 है, लिहाजा इसे जनता का अधिक प्रतिनिधित्व हासिल है. जनता के विचार सीधे तौर पर और जल्दी जानने के लिए ही हर दूसरे साल इसके प्रतिनिधियों को मतदाताओं के बीच जाना पड़ता है.

दूसरी ओर, सीनेटर का कार्यकाल छह साल का होता है और हर दूसरे वर्ष सीनेट के एक तिहाई सदस्यों को चुनाव का सामना करना पड़ता है.

काँग्रेस पर नियंत्रण के लिए रिपब्लिकन और डेमोक्रैट में मुकाबला होता है. हालाँकि सीनेट में कुछ समय के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत को छोड़ 1994 से काँग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा रहा है. पिछले 12 वर्षों के इतिहास में पहली बार डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में बहुमत हासिल किया है . ऐसा 1994 के बाद पहली बार हुआ है जब अमरीकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण हो गया है.

435 सदस्यीय हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में रिपब्लिकन पार्टी को वर्ष 2004 के चुनाव में 232 सीटें हासिल हुई थी और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को 202 सीटें मिली थीं. एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई थी.  जबकि  इन चुनाव मे  रिपब्लिकन पार्टी को  206 सीटें हासिल हुई  और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को 229 सीटें मिली है .

इसके साथ ही 100 सदस्यीय सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी की संख्या बढ़ कर 51 हो गई है जबकि

रिपब्लिकन पार्टी की संख्या 49 रह गई है . वर्ष 2004 के चुनावो मे रिपब्लिकन पार्टी की संख्या 56 थी.

उधर अर्कानसास, कोलोरैडो, ओहायो, मैसाचुसेट्स, मेरीलैंड और न्यूयॉर्क में गवर्नर पद के चुनाव में भी डेमोसंवाददाताओं का कहना है कि डेमोक्रैट की जीत से ऐसा लगता है कि अमरीकी जनता राष्ट्रपति बुश की इराक़ नीति से संतुष्ट नहीं है. डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत हुई है. एटर्नी जनरल एलियट स्पिट्ज़र न्यूयॉर्क के नए गवर्नर होंगे.

मध्यावधि चुनावों के नतीजे अमरीका में बड़े राजनैतिक बदलाव का संकेत दे रहे हैं. राष्ट्रपति बुश के दो वर्षों का शेष कार्यकाल पिछले दो वर्षों की तुलना में क़ाफी अलग साबित हो सकता है.

अमरीकी रक्षा मंत्री डॉनल्ड रम्सफ़ेल्ड की विदाई से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इराक़ मामले पर बुश सरकार किस तरह घिरी हुई है.

 

चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद एक पत्रकार वार्ता में राष्ट्रपति बुश ने यह स्पष्ट कर दिया था कि पेंटागन में किसी नए व्यक्ति को लाने की ज़रूरत है.

यानी जीत या हार, दोनों ही स्थितियों में बुश यह मन बना चुके थे कि युद्ध के शिल्पियों में से एक की विदाई कर दी जाए औऱ इसके लिए उनके पास कई जायज कारण भी थे.

रिपब्लिकन पार्टी के पराजय के मुख्य कारण: अमरीका के  चार मुख्य अख़बारों ने संपादकीय लिखी है उनमें आर्मी टाइम्स, एयरफ़ोर्स टाइम्स, नेवी टाइम्स और मरीन कॉप्स टाइम्स शामिल है. इन अख़बारों का कहना है कि रम्सफ़ेल्ड की वजह से ही अमरीका को इराक़ में असफलता हाथ लगी है.  इराक मे अब तक 3000 से अधिक सैनिक मारे जा चुके है इन सैनिको से संबंधित परिवार इराक़ की स्थिती से बेहद नाराज हैं.

बुश ने राष्ट्र के नाम संदेश मे पराजय के लिए स्वमं को जिमेवार ठहराते हुए कहा, “ ईरान युद्ध के दौरान प्रशासन की ओर से अपनाए गए तौर तरीकों ने ही प्रतिनिधि सभा व सीनेट का नियंत्रण डैमोक्रेटिक पार्टी के हाथ् मे जाने में महत्चपूर्ण भूमिका निभाई “

ईराक की लडाई सद्दाम द्धारा विनाशकारी जैविक व रासायनिक हथियार बनाएं जाने के अधार पर हुइ थी लेकिन हथियार वहां मिले नही तथा अमरीकनो ने यह अनुभव करना शुरु कर दिया कि इस से उन के देश की एक झूठे राष्ट्र की छवी बनी है.

हार का एक मुख्य कारण बुश प्रशासन मे व्याप्त भ्रष्टाचार भी है. चुनाव सर्वेक्षणों के मुताबिक आर्थिक और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों ने जनता को अपना नेता चुनने में अहम भूमिका निभाई.

कुछ माह पहले संसद के निचले सदन में रिपब्लिकन पार्टी के नेता टॉम डी ले को भ्रष्टाचार के आरोप में पद छोड़ना पड़ा था. उन्होंने पिछले चुनाव में पार्टी के लिए काफ़ी चंदा इकट्ठा किया था.

एक और सांसद मार्क फोली पर अश्लील ईमेल भेजने का आरोप लगा है.

इस बीच खुद बुश प्रशासन से जुड़े लोगों के कुछ ऐसे बयान आए हैं जिससे राष्ट्रपति के मुश्किले बढ़ी हैं.

पिछले दिनों विदेश मंत्रालय के अधिकारी अल्बर्टो फ़र्नांडेज़ ने कहा था कि इराक़ में अमरीका की नीति 'अंहकारी और मूर्खतापूर्ण' थी. हालाँकि बाद में उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए माफ़ी माँगी ली थी.

अमेरीकी चुनाव परिणामों का भारत पर असर: अमरीका में संसदीय चुनाव परिणामों के भारत के लिए अपने फ़ायदे-नुकसान हैं. एक तो इससे परमाणु समझौते को लेकर राष्ट्रपति बुश के प्रयासों में अड़चनें आ सकती हैं.

यदि यह विधेयक आगामी ‘लेम डक' (संसद के पिछले प्रस्तावों को निपटाने के लिए बुलाई जानी वाली बैठक) सत्र तक पारित नहीं हो पाता है तो आगे जाकर इसमें और दिक्कतें आ सकती हैं.

जहाँ तक बात डेमोक्रेट सांसदों की है तो भारत समर्थक लॉबी में वे बहुत ज़्यादा तादाद में हैं. वे चाहें तो इसमें काफी मदद कर सकते हैं.  दूसरे, जो लोग इस दफ़ा चुनाव जीत कर आए हैं उनके संबंध यहाँ बसे भारतीय समुदाय के लोगों से काफी अच्छे हैं.  भारत को अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन लाने की ज़रूरत नहीं है. हम अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से ही काम करते रहे हैं और प्रधानमंत्री के भी अभी तक के व्यक्तव्यों में ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी बदलाव की ज़रूरत हो.  

डेमोक्रेट दल के प्रमुख सांसदो ने कहा है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर वह बुश प्रशासन के साथ है और इस साल अमरीकी कांग्रेस मे यह विधेयक पारित हो जाएगा ।  डेमोक्रेट दल के नेता हैरी रीड ने कहा है ,“ भारत संसार का सबसे बडा लोकतंत्र है हम उस के साथ काम करना चाहते हैं और उचित होगा कि हम तय मार्ग पर ही चलें”

भारत की निगाह भी इन चुनावों पर टिकी हुई है. दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु समझौते को अमल में लाने के लिए इसे अमरीकी संसद का समर्थन मिलना ज़रूरी है.

सीनेट से इस बाबत विधेयक पारित हो चुका है लेकिन निचले सदन यानी हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में अभी इस पर मत विभाजन नहीं हुआ है.

इसलिए अब जब अगली बार कांग्रेस की बैठक होगी तो दलगत स्थिति में भी बदलाव दिखेगा. ऐसे में परमाणु समझौते का समर्थन करने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ी तो इसे पारित कराने में ज़्यादा मुश्किल नहीं होगी.

मध्यावधि चुनावों का प्रभाव: उधर मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की शानदार जीत के बाद राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उनसे कामकाजी संबंध बेहतर करने की दिशा में पहल की है.

मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद सबसे पहली गाज गिरी है डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड पर. उन्हें रक्षा मंत्री का पद छोड़ना है. राष्ट्रपति बुश ने उनकी जगह रॉबर्ट गेट्स को नया रक्षा मंत्री मनोनीत किया है. 63 वर्षीय गेट्स अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के पूर्व निदेशक भी रह चुके हैं.

अमेरीका के एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते यह स्पष्ट है कि 2008 मे होने वाले चुनावों से पहले बुश सरकार की नीतियों मे कुछ बदलाव जरुर आएगा ।